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SCO की बैठक में विदेश मंत्री जयशंकर ने उठाया पहलगाम हमले का मुद्दा
विदेश मंत्री एस. जयशंकर
Jul 16 2025

SCO की बैठक में विदेश मंत्री जयशंकर ने उठाया पहलगाम हमले का मुद्दा

कहा - आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाना होगा

तिआनजिन (चीन) : तिआनजिन में एससीओ बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पहलगाम आतंकी हमले का मुद्दा उठाया और आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस हमले का मकसद जम्मू-कश्मीर की पर्यटन अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना और धार्मिक तनाव फैलाना था। जयशंकर ने क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले का मुद्दा उठाया
इस दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले का मुद्दा उठाया और कहा कि सदस्य देशों को संगठन के मूल उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद जयशंकर की यह पहली चीन यात्रा है। उन्होंने कहा कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुआ आतंकी हमला जानबूझकर जम्मू-कश्मीर की पर्यटन अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और धार्मिक तनाव पैदा करने के मकसद से किया गया था। इस हमले में 26 लोगों की नृशंस हत्या कर दी गई थी।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने इस हमले की कड़ी निंदा की थी। सुरक्षा परिषद ने यह भी कहा था कि इस निंदनीय आतंकी हमले के अपराधियों, साजिशकर्ताओं, फंडिंग करने वालों और समर्थकों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए। जयशंकर ने कहा कि भारत ने ठीक ऐसा ही किया है और आगे भी करता रहेगा। जयशंकर ने कहा कि शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से मुकाबले के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने कहा कि ये तीनों समस्याएं अक्सर एक साथ देखने को मिलती हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, एससीओ को अपनी स्थापना के मूल उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहने के लिए आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाना ही होगा।

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत नए विचारों और प्रस्तावों को सकारात्मक रूप से स्वीकार करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस सहयोग का आधार आपसी सम्मान, संप्रभुता और सदस्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता होना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है, जब चीन के की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना की वैश्विक आलोचना हो रही है, क्योंकि इस परियोजना को कई देशों की संप्रभुता की अनदेखी और पारदर्शिता की कमी के रूप में देखा जाता है।

'वैश्विक व्यवस्था में भारी उथल-पुथल, स्थिरता की जरूरत'
जयशंकर ने यह भी कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात अस्थिर हैं और ऐसे समय में क्षेत्रीय सहयोग बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, आज हम एक ऐसे समय में मुलाकात कर रहे हैं, जब वैश्विक व्यवस्था में भारी उथल-पुथल है। पिछले कुछ वर्षों में हमने अधिक संघर्ष, प्रतिस्पर्धा और दबाव देखे हैं। आर्थिक अस्थिरता भी साफ दिख रही है। हमारे सामने चुनौती है कि हम वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करें, विभिन्न खतरों को कम करें और मिलकर उन समस्याओं का समाधान करें जो हमारे सामूहिक हितों के लिए खतरा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय बनती जा रही है। ताकत केवल कुछ देशों तक ही सीमित नहीं है। एससीओ जैसे समूहों का उभरना भी इसका उदाहरण है।

'सभी को साथ लेकर चलना होगा'
विदेश मंत्री ने कहा, हम वैश्विक मामलों को कितनी अच्छी तरह प्रभावित कर पाते हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि हम एक साझा एजेंडा पर कितनी एकजुटता से काम कर पाते हैं। इसका मतलब है कि सभी को साथ लेकर चलना होगा। उन्होंने एससीओ के भीतर सहयोग और भागीदारी को और गहरा करने का भी आग्रह किया।

अफगानिस्तान को मदद का आह्वान किया
विदेश मंत्री ने एससीओ से अफगानिस्तान को विकास सहायता बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, अफगानिस्तान लंबे समय से एससीओ के एजेंडे में है। क्षेत्रीय स्थिरता की मजबूरी के साथ-साथ हमें अफगान लोगों के कल्याण की भी चिंता है। जयशंकर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर एससीओ सदस्य, को विकास सहायता बढ़ानी चाहिए। भारत इस दिशा में निश्चित रूप से कदम उठाएगा। उन्होंने एससीओ सदस्य देशों के बीच परिवहन सुविधाओं और संपर्क को बेहतर बनाने की भी जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, एससीओ के भीतर सहयोग को गहरा करने के लिए अधिक व्यापार, निवेश और आदान-प्रदान जरूरी है। इसके लिए कुछ मौजूदा समस्याओं का समाधान करना जरूरी है। उन्होंने परिवहन की कमी को एससीओ क्षेत्र में एक बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि इसकी गैरमौजूदगी आर्थिक सहयोग की गंभीरता को कमजोर करती है। दूसरा मुद्दा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) के प्रचार को सुनिश्चित करना है। जयशंकर ने कहा, हमें भरोसा है कि यह परियोजना आगे बढ़ती रहेगी। आईएनएसटीसी भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए 7,200 किलोमीटर लंबी परिवहन परियोजना है। भारत इस परियोजना का समर्थन कर रहा है।

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