मौलाना मौदूदी, अरुंधति रॉय, ए जी नूरानी जैसे प्रसिद्ध की पुस्तकें "अलगाववाद’’ का प्रचार करती
श्रीनगर : ‘‘झूठे विमर्श को बढ़ावा देने और आतंकवाद का महिमामंडन करने’’ के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 25 पुस्तकों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाने के एक दिन बाद, पुलिस ने बृहस्पतिवार को इन किताबों को जब्त करने और इसके प्रसार को रोकने के लिए घाटी में छापेमारी की।
गृह विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार मौलाना मौदूदी, अरुंधति रॉय, ए जी नूरानी, विक्टोरिया स्कोफील्ड और डेविड देवदास जैसे प्रसिद्ध लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकें जम्मू-कश्मीर में ‘‘अलगाववाद’’ का प्रचार करती हैं और इन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 98 के अनुसार ‘जब्त’ घोषित किया जाना चाहिए।
पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाने के कदम की उनके लेखकों और राजनीतिक नेताओं के एक वर्ग ने कड़ी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि यह ‘‘कश्मीरियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चेतावनी देने’’ का एक प्रयास है, साथ ही कहा कि लोकतंत्र विचारों के मुक्त आदान-प्रदान से पनपता है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि बृहस्पतिवार को श्रीनगर, गांदरबल, अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा, शोपियां और बारामूला जिलों में किताबों की दुकानों पर छापे मारे गए। उन्होंने बताया कि सरकारी निर्देश के बाद पुलिस दलों ने इन जिलों में विभिन्न किताबों की दुकानों का निरीक्षण किया और प्रतिबंधित पुस्तकों की तलाशी ली।
अधिकारियों ने बताया, ‘‘कट्टरपंथी साहित्य को जब्त करने के लिए प्रवर्तन अभियान सरकारी निर्देशों के अनुरूप चलाए गए। इस अभियान का लक्ष्य अलगाववादी विचारधाराओं को बढ़ावा देने वाली या आतंकवाद का महिमामंडन करने वाली सामग्री थी।’’
पुलिस अधिकारियों ने बताया, ‘‘तलाशी के दौरान, किताबों की दुकानों के मालिकों को प्रतिबंधित सामग्री रखने या वितरित करने के खिलाफ चेतावनी दी गई। उन्हें इन निर्देशों का उल्लंघन करने के कानूनी परिणामों के बारे में भी बताया गया और दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया गया।’’
पुलिस ने शांति और अखंडता बनाए रखने के लिए जनता से सहयोग मांगा : उन्होंने कहा कि नागरिकों से आग्रह किया जाता है कि वे ऐसी प्रतिबंधित सामग्री से दूर रहें तथा प्रतिबंधित साहित्य के प्रसार सहित किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना निकटतम थाने में दें।
आदेश में कहा गया है कि जांच और विश्वसनीय खुफिया जानकारी पर आधारित उपलब्ध साक्ष्य ‘स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं’ कि हिंसा और आतंकवाद में युवाओं की भागीदारी के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक ‘झूठे विमर्श और अलगाववादी साहित्य का आंतरिक स्तर पर व्यवस्थित प्रसार है, जिसे अक्सर ऐतिहासिक या राजनीतिक टिप्पणी के रूप में पेश किया जाता है।’’
आदेश में कहा गया है कि यह भारत के खिलाफ ‘‘युवाओं को गुमराह करने, आतंकवाद का महिमामंडन करने और हिंसा भड़काने’’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) नेता और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि ‘‘सेंसरशिप विचारों को दबाती नहीं है, बल्कि उनकी गूंज को बढ़ाती है।’’
उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘लोकतंत्र विचारों के मुक्त आदान-प्रदान पर फलता-फूलता है। किताबों पर प्रतिबंध लगाने से इतिहास नहीं मिट सकता, यह केवल विभाजन को बढ़ावा देता है।’’
पीडीपी प्रमुख ने कहा, ‘‘लोकतांत्रिक आवाजों और मौलिक स्वतंत्रताओं को दबाने से अलगाव और अविश्वास बढ़ता है।’’ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इस प्रतिबंध को ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुला हमला’’ करार दिया।