यूपी सरकार चाहती है कि इसका अध्यक्ष सिर्फ “सनातनी हिंदू” हो
नई दिल्ली : बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। कोर्ट ने मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए एक अंतरिम समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है। इस पर यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सहमति जताई है, लेकिन साथ ही एक अहम शर्त भी रख दी है।
सरकार का कहना है कि समिति का नेतृत्व किसी ऐसे व्यक्ति को ही सौंपा जाए जो आस्था से सनातनी हिंदू हो। यानी किसी अन्य धर्म या पंथ को मानने वाले व्यक्ति को समिति का मुखिया न बनाया जाए। यह समिति तब तक मंदिर का संचालन देखेगी, जब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट बांके बिहारी कॉरिडोर को लेकर यूपी सरकार के लाए गए अध्यादेश पर अंतिम फैसला नहीं ले लेता।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाला बागची की बेंच के सामने यूपी सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज पेश हुए। उन्होंने कहा कि सरकार को समिति बनाने पर कोई ऐतराज नहीं है। कोर्ट की मंशा है कि हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज को इसका प्रमुख बनाया जाए।
सरकार ने सुझाव दिया कि इस समिति में मथुरा के डीएम, एसएसपी, मथुरा के मुनसिफ (जो 2016 से हाई कोर्ट के आदेश पर मंदिर प्रबंधन के मामले देख रहे हैं), नगर निगम कमिश्नर मथुरा, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव और ASI (भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण) के एक अधिकारी को भी शामिल किया जाए.
गोस्वामी परिवार, जो खुद को मंदिर का पारंपरिक प्रबंधक मानता है, इस समिति में नहीं होगा. गोस्वामी परिवार ने योगी सरकार के अध्यादेश की वैैधता को चुनौती भी दी है. उनके वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से कहा कि वे इस मामले में आपत्ति दर्ज कराएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शुक्रवार तक का समय दिया है.
वहीं, सरकार ने गोसाईं परिवार के दावे को खारिज करते हुए कहा, "जिस जमीन पर मंदिर है, वो राजस्व रिकॉर्ड में गोविंद देव मंदिर की है... मंदिर की स्थिति ऐसी है कि तुरंत कार्रवाई करके विकास कार्य शुरू करना जरूरी है."