कैंसर के इलाज अब नई तकनीक ‘नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग’ द्वारा...!
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नई दिल्ली: भारत में कैंसर के मामलों में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। कैंसर के मरीजों के मामले में आज भारत तीसरे नंबर है। यह आंकड़ा काफी डराने वाला है, लेकिन हाल ही में कैंसर के इलाज को लेकर एक अच्छी खबर सामने आई है।
अब तक ज्यादातर कैंसर के मरीजों को एक जैसी कीमोथेरेपी और दवाएं दी जाती थीं, लेकिन अब इलाज का तरीका बदलने वाला है। डॉक्टर्स अब मरीजों के डीएनए में हुए बदलाव के हिसाब से इलाज के लिए दवा चुनेंगे। आइए जानें इस बारे में।
डीएनए बदलाव पहचानकर कैंसर का इलाज
कैंसर के इलाज में इस आधुनिक तकनीक को नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (एनसीएस) कहा जाता है। यह एक जीनोमिक टेस्टिंग है, जो डीएनए में हुए बदलावों को पहचानने में मदद करेगी। इसका फायदा ये होगा कि डॉक्टर्स को अंदाजे से इलाज नहीं करना पड़ेगा और मरीज भी बेवजह की दवाओं के साइड इफेक्ट से बचेंगे।
कैसे होती है यह जांच और क्या है इसका खर्च?
एनसीएस में मरीज के खून, लार, टिश्यू या दूसरे बायोलॉजिकल सैंपल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद मशीन डीएनए का डिजिटल मैप तैयार करती है, जिसमें डॉक्टर्स जीन में हुए छोटे से छोटे बदलाव को भी आसानी से पहचान सकते हैं।
इससे बीमारी के जेनेटिक फैक्टर्स और दवाओं के होने वाले असर का बेहतर तरीके से पता चल पाएगा। हालांकि, अगर इस टेस्टिंग में होने वाले खर्च की बात करें, तो इस जांच की कीमत 20 हजार से 4 लाख तक जा सकती है।
80% मरीजों की आखिरी स्टेज पर पहचान
भारत में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इससे भी खतरनाक बात ये है कि देश में 80% से ज्यादा मरीजों की पहचान आखिरी स्टेज में होती है, जिससे मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है।
इसके अलावा, भारत में कैंसर का रूप पश्चिमी देशों से काफी अलग है, जैसे- फेफड़ों के कैंसर को बढ़ाने वाली एक जीन की खराबी पश्चिमी देशों में 25% है, वहीं भारत में यह सिर्फ 10% मरीजों में पाई जाती है। वहीं, एक दूसरी जीन की गड़बड़ी भारत मं 35% मरीजों में देखने को मिलती है, लेकिन पश्चिमी देशों के लोगों में सिर्फ 10-15% पाई जाती है।
साल 2030 तक काफी बढ़ेगा इस तकनीक का इस्तेमाल
इस तकनीक की मांग अब तेजी से बढ़ रही है, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि साल 2030 तक भारत में जेनेटिक टेस्टिंग का बाजार 27% की सालाना बढ़त के साथ करीब 14,155 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। साथ ही, कैंसर के प्रिसिजन मेडिसिन का बाजार भी पहले के मुकाबले पांच गुना बढ़ जाएगा
महंगी दवाएं हैं सबसे बड़ी बाधा
कैंसर के मरीजों के लिए बीमारी की पहचान के साथ-साथ दवाओं पर होने वाला खर्च भी एक बड़ी चुनौती है। कैंसर की दवाओं की कीमत एक से डेढ़ लाख तक है, जबकि कई जरूरी इंजेक्शन की शीशी सिर्फ एक लाख से ज्यादा की आती है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इनकी इलाज का खर्च कम हो, ताकि ज्यादा से ज्यादा मरीजों को इसका फायदा मिल सके।